अधिकांश लोग काल-सर्पयोग, पित्र दोष, गण्डमूल से ज्यादा रहते हैं भयभीत
गण्डमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चों में होती हैं गजब की अदभुत क्षमता
मुकेश वर्मा
हरिद्वार। ज्योतिषाचार्य पंडित विजय कुमार जोशी ने बताया कि ज्योतिष एक विज्ञान है जो सम्पूर्ण जीवन जीने के लिए मार्गदर्शक है, वर्तमान में इसके भिन्न-भिन्न रूप प्रचलित हो गये है। सिद्धान्त के आधार पर ज्योतिष नहीं रहा अब मनमाने उपाय बताकर लोगों को भटकाने और डराने का कार्य ज्यादा हो रहा है। आज के दौर में ज्योतिष विद्या एक ऐसी विद्या बन गयी है। जो आपको धर्म से दूर करके ग्रहों को पूजने की शिक्षा देती है, जोकि गलत है आज समाज मे बढ़ते शनि मंदिर इसका प्रमाण है, शायद आने वाले समय में अन्य ग्रहों के मंदिर भी बन जाये।
उन्होंने बताया कि आज लगभग 70 प्रतिशत जनता काल-सर्पयोग, पित्र दोष, गण्डमूल शांति इनसे ज्यादा भयभीत रहती है। वर्तमान कुछ वर्षों से गण्डमूल शांति का चलन ज्यादा हो गया है। जबकि गण्डमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चों में अदभुत क्षमता होती है, ये सामान्य बच्चों से काफी अलग होते है व मेहनत और संघर्ष के बाद अतुलनीय सम्पत्ति व यश के स्वामी होते है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्र होते है, इसमें केतू औऱ बुध के स्वामित्व में आने वाले नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्र कहते है। राशि और नक्षत्र के एक ही स्थान पर उदय और मिलन के आधार पर गण्डमूल नक्षत्रों का निर्माण होता है, इनके निर्माण में कुल 6 स्थितियां बनती है।
पंडित विजय कुमार जोशी ने बताया कि इसमें 3 नक्षत्र गण्ड और 3 मूल संज्ञक नक्षत्र कहलाते है, किसी भी चीज की संधि के समय को शुभ नहीं माना गया है। संधिकाल सदैव अशुभ , हानिकारक, कष्टदायक व असमंजसपूर्ण होता हैै। प्रकृति के नियमानुसार भी मौसम के सन्धि काल मे रोगों की उत्पत्ति होती है। ज्योतिष शास्त्र में गण्डमूल नक्षत्र के अंतर्गत अश्वनी, रेवती, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र को रखा गया है। ज्योतिष शास्त्र में फलित टीका में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति से बनने वाले अशुभ योगों की शांति के लिये उपाय के विधान भी दिए है। ज्योतिषी और अधिकांश कर्मकांडी ब्राह्मण ये सलाह देते है कि शांति करवा लेनी चाहिए अन्यथा अशुभ परिणाम होंगे ये पूरी तरह सत्य नही है और न ही प्रामाणिक है। वास्तविकता में केवल नक्षत्रों के आधार पर पूरा निर्णय नही लेना चाहिए, बल्कि कुंडली की दशा-अंतर्दशा और अन्य योगों को भी देखना चाहिए।
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि मैंने अपने जीवन मे लगभग 100 कुंडलियों पर शोध किया। इसमें अनेक परिहार कारक योग होते है। जिसमंे अनुभव के आधार पर देखा गया 80 प्रतिशत कुंडलियों में मूल नक्षत्र के दोष का परिहार स्वतः ही हो जाता है, शेष 20 प्रतिशत कुण्डलिया दोष पूर्ण पाई जाती है। जिसमें किसी भी विद्वान ज्योतिषी से परामर्श लिया जा सकता है। जिसमें कुछ बालक माता-पिता औऱ परिजनों के लिए कष्टप्रद होते है, जब परिवार को पता चलता है कि बच्चा मूल में पैदा हुआ तो वे नकारात्मक विचार से ग्रसित हो जाते है। बच्चा 12 वर्ष की आयु तक अपने माता-पिता की दशा- अंतर्दशा व कर्माे से प्रभावित होता है।
उन्होंने बताया कि इसलिए वो माता-पिता के इस नकारात्मक विचार को उन्ही के उपर प्रत्यारोपित कर देता हैै। ऐसे बहुत से परिवार मैंने देखे है कि सब कुछ होते हुए भी मन मे सदैव गण्डमूल का भय रहता है। इसलिए मेरा अनुभव रहा गण्डमूल की शान्ति न भी करवाये तब भी कोई समस्या नही होती। कुंडली के राजयोग, ग्रहों की स्थिति हानि-लाभ सब पूर्व जन्म के प्रारम्भ पर है वो निश्चित रूप से घटित होगा। किसी भी यज्ञ अनुष्ठान से इसमें परिवर्तन नहीं लाया जा सकता।
उन्होंने बताया कि हिन्दू धर्म कर्म प्रधान धर्म है भाग्य प्रधान नहीं, वेद उपनिषद और गीता कर्म की शिक्षा देती है, ज्योतिष सिर्फ मार्गदर्शक है। दृढ़ इच्छा शक्ति व सकारात्मक विचार ग्रहों में परिवर्तन ला देते है। इसलिए ’जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखे और निराशा को हावी न होने दे। कभी- कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है।
सकारात्मक सोच ही आदमी को आदमी बनाती है….
उसे अपनी मंजिल तक ले जाती है…।।
आप हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण , स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें
ज्योतिषाचार्य पंडित विजय कुमार जोशी
इमली मौहल्ला, कनखल, हरिद्वार
