क्या शहरी विकास मंत्री नाराजों को मनाने में हुए कामयाब?
20 नवम्बर तय करेगा किस दल का बनेगा मेयर
मुकेश वर्मा
हरिद्वार। निकाय चुनाव के मतदान के बाद मेयर सहित पार्षद प्रत्याशी अपने जोड घटाओं में लग गये है। मेयर प्रत्याशी पद पर भाजपा व काग्रेंस अपने-अपने प्रत्याशी की जीत के दावे कर रही है। लेकिन किस दल के दावें सार्थक होगे, यह तो 20 नवम्बर को साफ हो जाएगा। लेकिन वहीं पार्षद प्रत्याशी अभी कुछ भी बोलने से बच रहे है। वह केवल 20 नवम्बर के रिजल्ट आने के बाद तस्वीर साफ होने की दलिल दे रहे है। लेकिन इस निकाय चुनाव में भाजपा के प्रति लोगों में गुस्सा साफ देखा गया है। मगर इस गुस्से का खामियाजा अगर देखा जाए तो मेयर प्रत्याशी को ही भुगतना पड़ सकता है। जनता के भीतर तीन मुद्दे पूरे चुनाव के दौरान जहन में घुमते रहे। जिनका वास्ता आम लोगों से जुडा रहा, जिनमें एक किट्टी प्रकरण हैं जिसके माध्यम से गरीब व मध्य वर्गीय लोगों को करोडो का चूना लगाया गया। लोगों को करोड़ो का चूना लगाने वाले भाजपा से जुडे निकले। पीडितों ने विकास मंत्री से पैसे वापस दिलाने की गुहार लगाने के बाद भी वह मौन बने रहे। वहीं दूसरा मुद्दा हाईकोर्ट के अतिक्रमण हटाने के आदेश को तोड मरोड कर लोगों के बीच रखकर भेदभाव पूर्ण तरिके से अतिक्रमणों को ध्वस्त किया गया। आरोप लगा कि भाजपा से जुडे लोगों के निर्माणों को छोड दिया गया। इस मुद्दे को लेकर तो शहर के हर शख्स के बीच गुस्सा रहा। ऐसे ही तीसरा मुद्दा भी भाजपा के लिए कम परेशानी करने वाला नहीं रहा, क्यों कि पूर्व मेयर मनोज गर्ग भाजपा से रहे है। जिनका कार्यकाल भी जनता को कोई राहत व शहर के विकास में कोई योगदान देने वाला नहीं रहा है। उनके कार्यकाल ने भी जनता को काफी निराश किया है। ऐसे में भाजपा द्वारा मेयर प्रत्याशी के लिए ऐसी महिला का चयन कर जनता के बीच लाना भी घाटे का सौदा हो सकता है। जिसके सम्बंध् में जनता सहित भाजपा के लोग भी अनजान रहे। वरिष्ठ भाजपा के कार्यकत्र्ता और भाजपा से जुडे लोग दबी जुबांन से पूरे निकाय चुनाव प्रचार के दौरान एक ही बात फुंस फुंसाते नजर आये कि क्या भाजपा के पास ओर कोई प्रत्याशी नहीं था? इसलिए मेयर प्रत्याशी के लिए जीत हासिल करना भाजपा के लिए अंदुरूनी व बाहरी तौर पर एक चुनौती बना रहा। जिसका लाभ शहर में मेयर काग्रेंस प्रत्याशी अनीता शर्मा को मिलने के आसर नजर आ रहे है। काग्रेंस भी तीनों मुद्दों को लेकर काफी गद्गद् नजर आ रही है कि तीनों मुद्दों ने उनकी जीत आसान कर दी। लेकिन उसके बाद भी काग्रेंसियों में शहरी विकास मंत्री के चुनावी अनुभव का डर उन्हे कदम-कदम पर सताता रहा और यही डर काग्रेंसियों के लिए आगे बढने और चौंकना रहने की सीख देता रहा। इसी सीख के चलते काग्रेंसियों ने हर शख्स के भीतर अपने लिए जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है। लेकिन अभी कहना मुश्किल हैं कि भाजपा के लिए तीन मुद्दे उसके मेयर प्रत्याशी के लिए घातक साबित होगें या फिर शहरी विकास मंत्री अपने चुनावी अनुभव के चलते शहर की जनता के मुड को भांपते हुए उनको मनाने में कामयाब रहे है। यह तो आने वाली 20 नवम्बर तिथि ही तय करेगी कि कौन सी पार्टी अपने मेयर को नगर निगम की सीट पर काबिज कराने में सफल हो पाता है। वहीं पार्षद चुनाव को पार्टी बेस से हटकर व्यक्तिगत तौर पर लोगों में देखा जाता है। पार्षद का चुनाव हमेशा क्षेत्र के लोग प्रत्याशी की छवि व उसके कराये गये काम से करते है। निकाय चुनाव में कुल 226 पार्षद मैदान में हैं जिनमें भाजपा व काग्रेंस के 120 प्रत्याशी पार्षद और शेष दलों व निर्देलीय शामिल है। जिनके भाग्य का फैसला भी मत पेटियों में कैद हो चुका है। आगामी 20 नवम्बर कुछ प्रत्याशियों के लिए खुशी तो कुछ के लिए निराशा भरा लेकर आयेगा। शहर की जनता सहित राजनीतिक दलों की नजर अब मतगणना पर टिकी है।
