बागियों ने अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों की मुश्किले बढाई
स्थानीय नेता रूठें बागियों को मनाने में जुटे, दावा कि मना लेगें
मुकेश वर्मा
हरिद्वार। नगर निगम चुनाव के नामाकंन के बाद मेयर व पार्षद प्रत्याशी अपने-अपने क्षेत्र में जनता को लुभाने व अपनी गोठियां फिट करने में जुट गये है। प्रशासन की ओर से नामाकंन के बाद नामाकंन पत्रों की जांच की जा रही है। नामाकंन पत्रों की वापसी 27 को होनी है। इसलिए भाजपा व काग्रेंसी नेता अपने घोषित प्रत्याशियों को जिताने के लिए रणनीति तैयार करने में जुट गये है। साथ ही अपनी पार्टी से बागवत करने वाले नेता व कार्यकत्र्ताओं को नाम वापसी के लिए दबाव के साथ राजी करने की कोई कोर कसर नहीं छोड रहे है। नेताओं का दावा हैं कि रूठे कार्यकत्र्ताओं को मना लिया जाएगा, अगर नहीं मानते तो उनके खिलाफ अनुशासनहीनता की कार्यवाही की जाएगी। ऐसे में कुछ के नामाकंन वापसी की सम्भावना बनी हुई है। लेकिन कुछ प्रत्याशी जिन्होंने पार्टी से बागवत कर निर्देलीय नामाकंन किया हैं वह कुछ भी हो जाए, लेकिन पीछे नहीं हटेगेें कि तर्ज पर अपने सकंल्प के साथ डटे हुए है। बताते चले कि नगर निगम व नगर पालिका चुनाव की बिगुल बजते ही मेयर, पालिकाध्यक्ष, पार्षद और सभासदों के लिए भाजपा व काग्रेंस पार्टी में टिकट मांगने की होड शुरू हो गयी थी। जिसमें टिकट पाने के लिए प्रदेश व दिल्ली हाईकमान तक टिकट पाने के लिए अपने आकांओं का सहारा लिया था। जिनमें कुछ सफल हुए, तो कुछ को निराश हाथ लगी। मगर कुछ नेता व कार्यकत्र्ता ऐसे भी थे। जिनको प्रदेश व स्थानीय बडे लीडरों ने निकाय चुनाव में टिकट दिलाने का वादा किया था। मगर उनको टिकट न मिलने पर उनमें भारी रोष देखा गया। जिनमें कुछ ने दबी जुबान पर अपने नेताओं को कोसा और वादा खिलाफी का आरोप भी लगा कर शांत हो गये। लेकिन कुछ ऐसे भी नेता व कार्यकत्र्ता सामने आये। जिन्होंने अपनी आवाज बुलंद करते हुए पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशियों के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरते हुए निर्देलीय नामाकंन किया। जिन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों के लिए परेशानी पैदा कर दी है। लेकिन पार्टी के नेता ऐसे बागी नेताओं व कार्यकत्र्ताओं को समझाने करते हुए उनसे नामाकंन वापस करा लेने का दावा कर रहे है। मगर यह दावे कितने सार्थक होगे, इस बात की जानकारी 27 अक्टूबर को सामने आ जाएगी। लेकिन इतना जरूर हैं कि कुछ नेता व कार्यकत्र्ता तो पार्टी के नेताओं को अपनी नाराजगी दिखाने के लिए नामाकंन किया हैं, जिनके एक बार में ही पार्टी के नेताओं द्वारा वापसी के लिए कहने पर ही वह नामाकंन वापस ले लेगेें। मगर यह बात सभी बागी नेताओं व कार्यकत्र्ताओं पर लागू नहीं हो रही है। बागियों में ऐसे भी नेता हैं जोकि लम्बे समय से पार्टी से जुडे रहे और पार्टी के लिए मिल का पत्थर भी साबित हुए है। उनका टिकट कट जाने पर उन्होंने अब मैदान में उतरना अपना स्वाभिमान मान लिया है, जीत हो या फिर हार वो बात अलग है। मगर निकाय चुनाव में मैदान में लड़ना अब उनके लिए स्वाभिमान की लड़ाई बन गयी है। ऐसे बागी नेताओं ने पार्टी के प्रत्याशियों के लिए मुश्किले खड़ी कर दी है। देखना होगा कि इस निकाय चुनाव में पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशी जीत हासिल करते है।
