
उत्तम चरित्र एवं मर्यादित आचरण की प्रेरणा देेते हैं
मुकेश वर्मा
हरिद्वार। रामलीला का दर्शन समाज के चारित्रिक उन्नयन का माध्यम है और राम से लेकर रावण तक जितने पात्रों को रंगमंच पर दर्शाया जाता है वे सभी उत्तम चरित्र एवं मर्यादित आचरण की प्रेरणा देेते हैं। उक्त विचार हैं शिक्षक मनोज सहगल के जो हरिद्वार की एक रामलीला में रावण सहित कई अन्य पात्रों का अभिनय करते हैं। प्रेस को जारी एक बयान में मनोज सहगल ने बताया कि रघुकुल भूषण भगवान राम चरित्र निर्माण एवं मर्यादित आचरण की प्रतिमूर्ति हैं तो चारो वेदों के ज्ञाता महाबली रावण का चरित्र भी समाज में उस वर्ग के लिए प्रेरणादायी है जो प्रभुता पाकर मदहोशी का शिकार हो जाता है और अपना सर्वस्व खो बैठता है। रामलीला के प्रत्येक पात्र को चरित्र निर्माण का प्रणेता बताते हुए उन्होंने कहा कि रावण ने सीता स्वयंवर के समय भी अपने आराध्य भगवान शिव के धनुष को तोड़ने से इंकार कर दिया था तो वाणासुर संवाद में भी रावण ने अपने राजसी स्तर को गिराया नहीं। रावण ने मानवता एवं विद्वता का परिचय देते हुए भगवान राम के बुलावे पर सेतुबन्ध रामेश्वरम् की स्थापना राम के साथ मिलकर की तथा आशीर्वाद स्वरुप भगवान राम को विजयी होने का वरदान भी दिया। रावण ने महाबली एवं सर्वशक्तिमान होते हुए भी राम के दूत हनुमान को न तो मारा न ही बन्दी बनाकर कारागार में डाला केवल सांकेतिक सजा देकर छोड़ दिया और इतना ही नहीं रावण माता सीता से मिलने अशोक वाटिका में कभी भी अकेले नहीं गया और न ही उनके तन का स्पर्श किया। उसने दुश्मनी होते हुए भी मानवता के धर्म का निर्वाह किया। रावण की दरियादिली की दाद देते हुए उन्होंने बताया कि शत्रु सेना होते हुए भी लक्ष्मण जी जब शक्तिबाण से मूर्छित हो गए तो लंका के ही सुषेन वैद्य ने उनका उपचार किया यदि रावण नहीं चाहता तो क्या उसकी मर्जी के बगैर सुषेन वैद्य रामादल में जा सकते थे। मृत्यु तो जीवन का सत्य है लेकिन जिसकी मुक्ति भगवान के हाथों हो उससे बड़ा सौभाग्यशाली भला कौन हो सकता है? लंकेश को उसके कर्म एवं व्यवहार के आधार पर सौभाग्यशाली होने का वास्ता देते हुए शिक्षक मनोज सहगल ने बताया कि रावण के प्राणों का हरण करने कोई यमराज नहीं आया था बल्कि श्रीहरि नारायण के अवतारी भगवान राम स्वयं उसको मुक्ति प्रदान करने के लिए उसके घर पर गए थे।
