♦कनखल पुलिस ने न्याय दिलाने के बाजय पीडिता बुजुर्ग को बैरंग लौटाया
♦घटना ने पुलिस प्रशासन के बुजुर्गो की सुरक्षा व न्याय दिलाने के दावों की खोली पोल
♦एसडीएम न्यायालय के आदेशों का भी पुलिस नहीं करा पा रही पालन
♦पीडिता बुजुर्ग न्याय पाने के लिए दर-दर भटकने के लिए हो रही मजबूर
पारस सिंह
हरिद्वार। कभी जिन नन्हें हाथों को थामकर दुनिया में चलना सिखाया, दुध पिलाकर पाला पोसा, इंसान बनाने के लिए हर संभव कार्य किया, लेकिन शायद परवरिश में कमी रही या बदलते दौर का प्रभाव पड़ा, आज उन्हीं हाथों ने अपनी उस मां को ने केवल घर से बाहर निकाल फेंका, बल्कि दर-दर भटकने को मजबूर कर दिया।
मामला हरिद्वार के कनखल क्षेत्र के हिमगिरि विहार का हैं, जहां रहने वाली 64 वर्षीय विधवा महेंद्र कौर के साथ घटी यह घटना समाज के नैतिक पतन को उजागर करती है। आरोप है कि पीड़िता जब कनखल पुलिस के पास गई तो पुलिस ने घर का मामला बता कर न्याय दिलाने की बजाय पीडिता को बैरंग लौटा दिया। इस घटना ने हरिद्वार पुलिस प्रशासन के उन तमाम दावों की पोल खोल दी, जिसमें सीनियर सिटीजन की सुरक्षा व उनके अधिकार दिलाने के बडे-बडे दावे हरिद्वार पुलिस प्रशासन द्वारा किये जाते रहे है।
बताया जा रहा हैं कि पीडिता महेंद्र कौर के जीवन में कठिनाइयाँ मई 2023में शुरू हुईं, जब उनके पति गायत्री प्रसाद का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। अपने पति की विरासत को सुरक्षित रखने की चाह में उन्होंने और अन्य उत्तराधिकारियों ने गैस एजेंसी का स्वामित्व अपने बेटे को सौंप दिया। लेकिन यह सौंपने की प्रक्रिया मानो उनके लिए बर्बादी की दस्तक थी। बेटे और बहू का व्यवहार धीरे-धीरे कठोर होता गया। स्थानीय निवासियों के अनुसार बेटा और बहु अक्सर महेंद्र कौर के साथ अपमानजनक भाषा में बात करते थे। घर में अपशब्दों और तानों का माहौल आम हो गया था।
आरोप हैं कि बेटे-बहू ने न केवल मानसिक यातनाएं दीं, बल्कि खुले शब्दों में यह तक कह दिया कि यह घर और इसमें रखा हर सामान सिर्फ उनका है, और इसमें उनकी कोई जगह नहीं। यह वही घर था जिसे उन्होंने और उनके दिवंगत पति ने मेहनत और संघर्ष से बनाया था, लेकिन अब उन्हें उसी घर से बेदखल कर दिया गया है। लेकिन बेटा और बहू इसे पारिवारिक मामला बताकर चुप्पी साधे हुए हैं।
वरिष्ठ नागरिक संरक्षण अधिनियम 2007 के तहत माता-पिता को भरण-पोषण और देखभाल का अधिकार प्राप्त है। यदि संतान माता-पिता को प्रताड़ित करती है या घर से बाहर निकालती है, तो उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी कानून का सहारा मिला, लेकिन शायद अधूरा। दरअसल उपजिलाधिकारी न्यायालय द्वारा पीड़िता की याचिका स्वीकार करते हुए बिष्णु गार्डन स्थित मकान के उपरी तल पर रहने तथा भरण-पोषण के लिए दस हजार प्रति माह देने के निणर्य भी दिया।
बताया जाता है कि शुरू मेें तीन माह तो दस-दस हजार दिया गया, लेकिन बाद मेे वह भी बंद कर दिया। अभी गत दिनो विघवा महेन्द्र कौर कनखल थाना पहुची और पुलिस को उपजिलाधिकारी न्यायालय का आदेश दिखाते हुए मकान में दाखिल करने की गुहार लगायी। पुलिस पहले तो मामले को पारिवारिक बताकर टालने का प्रयास किया, लेकिन पीड़िता के साथ आये लोगों का दबाव बनने पर पीडिता महेन्द्र कौर को लेकर मकान के उपरी तल पर लेकर पहुची, लेकिन कमरे में कोई भी सामान नहीं था इसलिए रहने में असुविधा को देखते हुए फिलहाल अपनी बेटी के पास पहुची।
क्या हम सच में उस युग में आ गए हैं, जहां माता-पिता के त्याग और प्रेम की कोई कीमत नहीं बची? यह वही देश है जहां माता-पिता को देवताओं के समान पूजा जाता था, लेकिन अब क्या हम इतने पत्थरदिल हो गए हैं कि हमें उनके दर्द का अहसास भी नहीं होता? यह कहानी सिर्फ महेंद्र कौर की नहीं, बल्कि हर उस मां की है, जिसने अपने बच्चों को अपना सर्वस्व दिया और बदले में अपमान और आंसू पाए। क्या हम अब भी चुप रहेंगे या इस कलयुगी अन्याय के खिलाफ साथ खड़े होंगे?
वही दूसरी ओर पीड़िता के बेटे ने माँ के द्वारा लगाए जा रहे आरोप को गलत बताते हुए कहा कि वे अपनी मर्जी से अपनी बेटी के पास गई हैं। उन्होंने अपने कमरे में खुद अपना ताला लगाकर गई हैं। हालांकि सवाल यह जरूर उठता है कि बिना बात के कोई भी माँ क्यो अपने बच्चों पर झूठे आरोप लगा रहे हैं.।
