आज धरा का पुत्र ,गँगा में मिल गया ,
ज्वलित हुआ नमित मन द्रवित हो हिल हिल गया ।।
आज धरा का पुत्र ——–
हर लहर लहर से एक– ऐसी वेदना उठी,
आज फिर कैसी— एक ये घटना घटी
चीत्कार कर उठा– हर मन– हिल हिल गया ,
आज धरा का पुत्र ,गंगा में -मिल मिल गया।।
चमक तो रहा है सूरज ,मगर किरणे भी –बेचैन है,
कभी बदरी सी छा ती, जिसको नहीं कहीं– चैन हैं,
देख लूँ -उसकी झलक- मैं, अम्बर भी विचलित हुआ ,
आज धरा का पुत्र चला ,गंगा में समाहित हुआ,
ऊँचा ललाट,तेजस्वी भाल, धनक गर्जना की आवाज,
नहीं किसी से कोई आस, बस देश प्रेम की प्यास,
उसके ही इरादे पर पोखरण हिल हिल गया,
आज सबका प्रिय अटल गंगा में मिल मिल गया
घट घट से उठी वेदना नमित हो हिल हिल गय
आज धरा का पुत्र गंगा में समाहित हुआ ,,
मनु शिवपुरी
